EPS 95 अपील को सुनवाई के लिए लाने में तिकड़म, फिर कोशिश है कि अगली सुनवाई जस्टिस ललित की पीठ ही करे

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दादा तुकाराम झोड़े-

मुझे ईपीएस-95 सेवानिवृत्त दोस्तों के हमेशा बहुत सारे फोन कॉल आते हैं। वे जानना चाहते हैं कि उनके सुप्रीम कोर्ट में फंसे मामलों का क्या हुआ।।? मैं सत्य की विजय पर विश्वास रखता हूं। इसलिए इस प्रश्न पर मेरी राय स्पष्ट है। पेंशनरों की यह आशंका कि “उन्होंने हमें 24-08-2021 की स्थिति में पहुंचा दिया है और अब हम पेंशनरों की बर्बादी के लिए एक ही कदम बचा है, सही नहीं है।” पेंशनर दोस्तों, मैं आपको बताना चाहता हूं कि यह उनके लिए इतना आसान नहीं है। क्योंकि कानून पूरी तरह से, 100%, हमारी तरफ है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘सच्चाई हमारी तरफ है। मैं हमेशा मानता हूं कि जीत हमेशा सच की होती है। तो इस संबंध में सरकार या व्यवस्था कितनी भी साजिश करे, जीत हमारी होनी तय है।

साथियों, वास्तव में, सुप्रीम कोर्ट में हमारे मामले बहुत अच्छी स्थिति में नहीं हैं। यह केंद्र की भाजपा सरकार की नीति और माननीय सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति यूयू ललित के कारण है। सुप्रीम कोर्ट में हमारा, आपका अटूट विश्वास है, लेकिन हमारे मामलों में आड़े आया है- जस्टिस यूयू ललित की बेंच का गैरकानूनी फैसला।

2014 में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद, केंद्र सरकार ने 1-09-2014 से ईपीएस 1995 अधिनियम में कुछ मजदूर विरोधी बदलाव किए। केरल उच्च न्यायालय में 507 मामलों में लगभग 15,000 लोगों द्वारा परिवर्तनों को चुनौती दी गई थी। इन मामलों की सुनवाई के बाद, केरल उच्च न्यायालय ने 12-10-2018 को कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया और 1-09-2014 से लागू सभी परिवर्तनों को रद्द कर दिया।

केंद्र सरकार और कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) ने बाद में फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने भी केरल उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा और केंद्र सरकार एवं EPFO की विशेष अपील को 01-04-2019 को खारिज कर दिया। बीजेपी सरकार को सुप्रीम कोर्ट का बीजेपी सरकार द्वारा पारित EPS 1995, 2014 कानून को निरस्त करना पसंद नहीं आया, तब मोदी सरकार स्वयं ईपीएस 95 मामले में कूद पड़ी है और तब से ईपीएस 95 की कानूनी लड़ाई शुरू हो गई है।

सुप्रीम कोर्ट के दिनांक 1-04-2019 के फैसले के खिलाफ EPFO ने पुनर्विचार याचिका दायर की है। पिछली विशेष अपील और पुनर्विचार याचिकाओं में केंद्र सरकार के प्रतिनिधित्व के बावजूद, केंद्र सरकार ने फिर से एक अलग विशेष अपील (एसएलपी) दायर की और भारत के महान्यायवादी केके वेणुगोपाल को इस के लिए नियुक्त किया गया। केंद्र सरकार ने तब से सेवानिवृत्त लोगों के खिलाफ गैरकानूनी तिकड़म शुरू कर दी है।

अपील को सुनवाई के लिए लाने में तिकड़म!

वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में झूठा बयान देकर सुप्रीम कोर्ट को गुमराह किया कि अगर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू किया गया तो सरकार को 15।29 लाख करोड़ रुपए का नुकसान होगा। साथ ही बड़ी ही चालाकी से उन्होंने उपरोक्त अपील एवं केंद्र सरकार की विशेष अपील को संलग्न किया। लेकिन इस अपील को उस पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए नहीं लाने दिया गया, जिसने उस पर या उस पीठ के किसी न्यायाधीश द्वारा पूर्व में फैसला सुनाया गया था। इसके लिए ईपीएस 95 से संबंधित सभी मामलों को फिर पुनर्विचार याचिका और विशेष अपील याचिका के साथ संलग्न किया गया और 2021 तक लंबित रखा गया।

सुनवाई 2021 में जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच के सामने शुरू हुई। पहली सुनवाई 29-01-2021 को हुई थी। भविष्य निधि अधिवक्ताओं के सम्मन के बाद, अदालत ने अपील की अनुमति दी और विशेष अपील पर फिर से सुनवाई करने का फैसला किया। लेकिन फैसले में विपक्ष को बोलने का मौका नहीं दिया गया और कोर्ट ने विपक्ष की बात सुने बिना एकतरफा गैरकानूनी फैसला लेते हुए विपक्ष के पेंशनभोगियों के साथ अन्याय कर डाला।

तीन जजों की पीठ ने जिसे खारिज किया, उसकी अपील दो जजों के सामने कैसे?

बाद में, 25-02-2021 को मामले सुनवाई के लिए न्यायमूर्ति ललित की दो सदस्यीय पीठ के समक्ष आए। इससे पहले प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने EPFO की विशेष अपीलीय याचिका खारिज कर दी थी। अब प्रश्न यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने खारिज कर दी थी, तब उसी अपील को सुनवाई के लिए दो सदस्यीय पीठ के समक्ष कैसे लाया गया।।?

अवमानना मामलों को स्थगित कर देना पहला कदम।।!

इस मामले में दो सदस्यीय पीठ द्वारा 25-02-2021 को सभी प्रकरणों को सुनवाई के लिए चार धाराओं में बांटा गया और फिर ईपीएस 95 से संबंधित ‘अवमानना के सभी प्रकरणों को स्थगित’ कर दिया गया। यद्यपि याचिकाकर्ताओं की ओर से ऐसी कोई मांग या दलील नहीं थी। अदालत द्वारा अवमानना मामलों को स्थगित कर देना सेवानिवृत्त पेंशनरों के साथ अन्याय और गैरकानूनी ही था।


आरसी गुप्ता केस के मान्य फैसले को विवादास्पद ठहरा देना

इन मामलों की सुनवाई दो दिन 17-08-2021 और 18-08-2021 को हुई। दो दिन तक अदालत ने EPFO के अधिवक्ताओं को सुना और अंत में विपक्ष के अधिवक्ताओं से कहा कि हम इन सभी मामलों को ‘आरसी गुप्ता मामले’ में पारित आदेश के गुण-दोष की जांच के लिए तीन सदस्यीय या इससे बड़ी पीठ के पास भेज रहे हैं। बाद में, विपक्ष के विचारों को सुने बिना, 24-08-2021 को न्यायमूर्ति ललित ने आदेश दिया कि ‘आरसी गुप्ता मामले’ में पारित आदेश की ‘सत्यता’ का पता लगाने के लिए मामले को एक बड़ी पीठ के पास भेजा जाए।

दरअसल, पिछले आठ मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसले (दिनांक 31-03-2016 और दिनांक 12-07-2016) के अनुसार ‘आरसी गुप्ता मामले’ में फैसला सुनाया गया था। आरसी गुप्ता केस में पारित आदेश पर किसी ने, न सरकार ने और न EPFO ने ही कभी आपत्ति नहीं की, किसी ने भी इसे कहीं भी चुनौती नहीं दी, सुप्रीम कोर्ट में लंबित किसी भी मामले में आरसी गुप्ता केस के फैसले पर गलत होने दावा नहीं किया गया या ऐसी कोई प्रार्थना सामने नहीं नहीं आई। इससे साफ हो गया कि आरसी गुप्ता केस पर फैसला फाइनल में पहुंच चुका है।

आरसी गुप्ता केस के फैसले को मान्य कर लिया था 2017 में ही

इतना ही नहीं, आरसी गुप्ता केस के निर्णय को केंद्र सरकार ने 16-03-2017 को मान्यता दे थी। उसके बाद उसे लागू करने के लिए EPFO ने 23-03-2017 को एक सर्कुलर भी जारी कर दिया था। इसके तहत देश में लगभग 27,000 लोगों की पेंशन का पुनर्निर्धारण कर EPFO ने उसे स्वीकार भी कर लिया था। इतना ही नहीं EPFO के मुख्य आयुक्त डॉ। वी।पी। जॉय ने सुप्रीम कोर्ट में दायर एक अवमानना याचिका में एक हलफनामा दायर कर कहा है कि ‘हम आरसी गुप्ता जैसे सेवानिवृत्त पेंशनभोगियों की पेंशन को पुनर्निर्धारित कर रहे हैं।’

लेकिन EPFO अधिवक्ता ने आरसी गुप्ता केस पर फैसला गलत करार दिया, बेंच ने मान भी लिया

लेकिन अब अदालत में भविष्य निधि ( EPFO) अधिवक्ता का तर्क आया कि आरसी गुप्ता केस पर फैसला गलत है। न्यायमूर्ति यूयू ललित ने इसे तुरंत मान भी लिया। साथ ही आदेश दे दिया कि इसकी बड़ी पीठ द्वारा समीक्षा की जानी चाहिए। यह दुर्भाग्य की बात है कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय के इतिहास में पहली बार ऐसा अनोखा गैरकानूनी आदेश और गैरकानूनी निर्णय जारी किया गया है।

“मोदी है तो सब मुमकिन है” कर दिखाया कोर्ट ने

साथियों, कोर्ट का और मुख्य रूप से जस्टिस यूयू ललित का 24-08-2021 का फैसला चौंकाने वाला और भारतीय न्यायपालिका के लिए शर्मनाक है। क्योंकि मामला केरल हाईकोर्ट के 12-10-2018 के फैसले और 1-9-2014 के कानून में बदलाव का है और कोर्ट आरसी गुप्ता केस के फैसले के बारे में फैसला देती है। जबकि केरल हाई कोर्ट ने आरसी गुप्ता फैसले पर भरोसा किया था, लेकिन तब भी सरकार या EPFO ने आरसी गुप्ता का विरोध नहीं किया और आरसी गुप्ता केस का फैसला जब फाइनल मान्य कर लिया गया, तब अदालत के लिए ऐसा फैसला देना संभव नहीं हो सकता। लेकिन भाजपा का नारा है “मोदी है तो सब मुमकिन है” और यही आप हैं देख रहे हैं। न्यायमूर्ति यूयू ललित का 24-08-2021 का निर्णय न केवल अवैध है, बल्कि यह निर्णय देकर न्यायमूर्ति यूयू ललित ने पेंशनभोगियों को ठगने, डराने और गलत तरीके से निराश करने का काम किया है। आशंका जताई जा रही है कि यह सब एक सुनियोजित साजिश है और ‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार में यह सब संभव हो गया है।’

फिर कोशिश है कि अगली सुनवाई जस्टिस ललित की पीठ ही करे

अब ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद इन सभी मामलों को न्यायमूर्ति यूयू ललित की पीठ के समक्ष ही लाने का प्रयास किया जा रहा है। केंद्र की भारतीय जनता पार्टी की सरकार कानून के शासन की लड़ाई में हार नहीं मानती है और इसके लिए कुछ भी कर सकती है। वे न्यायमूर्ति यूयू ललित या अपनी सुविधा के किसी न्यायाधीश की अदालत में मामले की सुनवाई करवा कर अपनी सुविधानुसार गैरकानूनी आदेश को ला सकते हैं। जस्टिस यूयू ललित का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने हमें 24-08-2021 की स्थिति में पहुंचाने की कोशिश को अंजाम तो दे ही दिया है और उन्हें अब लगने लगा है कि पेंशनभोगियों को बर्बादी के लिए एक ही कदम बचा है।

लेकिन दोस्तों, विश्वास बनाए रखें, यह इतना आसान नहीं है, क्योंकि कानून पूरी तरह से, 100% हमारी तरफ है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सच्चाई हमारी तरफ है और मैं हमेशा मानता हूं कि जीत हमेशा सच की होती है। तो इस संबंध में सरकार कितनी भी गैरकानूनी साजिश करे, जीत हमारी होनी तय है।

मेरी राय में, मैंने जो कुछ भी गैरकानूनी महसूस किया है, तथ्यों के साथ कह दिया है। हो सकता है कुछ लोग मेरी बात से सहमत न हों, इसका कोई इलाज नहीं है। लेकिन दोस्तों, सच तो सच होता है, बदलता नहीं।

शुक्रिया।।!


 


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